ज़मीन की ख़ातिर यह जंग क्यों है

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शायरी

"खुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीन पर, ज़मीन की ख़ातिर यह जंग क्यों है?

हर एक फ़तह-ओ-ज़फ़र के दामन पे ख़ून-ए-इंसान का रंग क्यों है?

ज़मीन भी तेरी, हम भी तेरे, यह मिल्कियत का सवाल क्या है?

यह क़त्ल-ओ-ख़ून का रिवाज क्यों है, यह रस्म-ओ-जंग-ओ-जदाल क्या है?

जिन्हें तलब है जहान भर की, उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है?

खुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीन पर, ज़मीन की ख़ातिर यह जंग क्यों है?"

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