"खुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीन पर, ज़मीन की ख़ातिर यह जंग क्यों है?
हर एक फ़तह-ओ-ज़फ़र के दामन पे ख़ून-ए-इंसान का रंग क्यों है?
ज़मीन भी तेरी, हम भी तेरे, यह मिल्कियत का सवाल क्या है?
यह क़त्ल-ओ-ख़ून का रिवाज क्यों है, यह रस्म-ओ-जंग-ओ-जदाल क्या है?
जिन्हें तलब है जहान भर की, उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है?
खुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीन पर, ज़मीन की ख़ातिर यह जंग क्यों है?"
